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हिंदी दिवस विशेष

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हिंदी; एक अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में ---------------------------------------------- आज हिंदी दिवस है। आज ही के दिन सन् १९४९ को हिंदी को राजभाषा के रूप में अपनाया गया था और आज भी यह राजभाषा के रूप में विद्यमान है। हम, आप और सभी जानते हैं कि आज हिंदी सिर्फ भारत में नहीं बल्कि विश्व के प्राय: हर देश में बोली जाती है और यह हमारे लिए गर्व की बात है  कि हिंदी आज विश्व की तीसरी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है। चीन की भाषा मंदारिन दुनिया की सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है पर एक रिपोर्ट के मुताबिक आज हिंदी इतनी लोकप्रिय हो गई है कि आने वाले दिनों में यह मंदारिन से भी ज़्यादा बोली जाने लगेगी। यह हमारे लिए बहुत ही खुशी की बात है कि जिस जो हमारी मातृभाषा है वह दुनिया की सबसे ज़्यादा बोले जाने वाली भाषा है। पर, हमारे देश में अब स्थिति उल्टी होती जा रही है । एक तरफ दूसरे देश के लोग हिंदी की संस्कृति आदि जानने के लिए हिंदी सीख रहे और भारत आकर शोध कर रहे वहीं हम भारतीय अंग्रेजी के पीछे भाग रहे । इसमें अंग्रेजी का कोई दोष नहीं यह सब भूमंडलीकरण का प्रभाव है जो आज सब देशों क े सर चढ...

मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास " मल्लिका " की समीक्षा

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इति हास में खोयी हुई नारी और ' मल्लिका ' उपन्यास:--- मल्लिका इतिहास की एक ऐसी उपेक्षित महिला है जिसने साहित्य में तो अपना अमूल्य योगदान दिया लेकिन उनके अवदान को किसी हिंदी साहित्य के इतिहासकार ने नहीं समझा। यही कारण है कि हम मल्लिका के बारे में इतिहास के किसी भी पन्ने में नहीं पड़ते हैं। इसी उपेक्षित महिला के महत्व को समकालीन कथा लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ (जो कि अपनी विशेष प्रकार की कथाओं के लिए प्रसिद्ध है) ने उजागर करने का प्रयास किया है।           मनीषा कुलश्रेष्ठ जी ने बहुत ही बारीकी से इतिहास को खंगाला है, तत्पश्चात उन्होंने मल्लिका के जीवन को उघाड़ने का प्रयास किया है। "मल्लिका " उपन्यास में लेखिका ग़ल्प  तथा कल्पना के पुट  से ऐसी रचना का निर्माण किया है जो अतुलनीय है जिसका कोई तोड़ नहीं है। जैसा कि मनीषा जी ने उपन्यास के प्राक्कथन में ही स्पष्ट कर दिया है कि " मल्लिका की कथा ग़लत होते हुए भी ऐसे संपूर्ण व्यक्ति की कहानी है जो हाड़-मांस से बना, किन्हीं बीते वक्तों में भी जीता हुआ, सांस लेता था। उसके होने के अल्प ही सही ओझल ह...

अक्टूबर जंक्शन उपन्यास की महत्त्वपूर्ण पंक्तियाँ

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  अक्टूबर जंक्शन उपन्यास की महत्त्वपूर्ण पंक्तियाँ जो हमारे जीवन से जुड़े हैं या किसी रूप में जुड़ सकते हैं। ---------------------------------------------------------------------- यह कहानी शुरू ही ना हुई होती। अगर उस वेटर ने अपना बिजनेस बढ़ाने के चक्कर में इन दोनों को साथ नहीं बैठा दिया होता। इस कहानी में वेटर का काम इतना ही था। अब वह इन का आर्डर देने के बाद कभी वापिस नहीं आएगा। आपने कभी सोचा है। रोज तमाम कहानियां ऐसे ही वह लोग शुरू करते हैं जिनको कभी पता ही नहीं चलता कि वह कहानी का कितना अहम हिस्सा है। हर अधूरी मुलाकात एक पूरी मुलाकात की उम्मीद लेकर आती है। हर पूरी मुलाकात अगली पूरी मुलाकात से पहले की अधूरी मुलाकात बन कर रह जाती है। एक अधूरी उम्मीद ही तो है जिसके सहारे हम बूढ़े हो कर भी बूढ़े नहीं होते हैं। किसी बूढ़े आशिक ने मरने से ठीक पहले कहा था कि एक छटांक भर उम्मीद पर साली इतनी बड़ी दुनिया टिक सकती है तो मरने के बाद दूसरी दुनिया में उसकी उम्मीद बनकर तो मर ही सकता हूं। बूढ़ों की उम्मीद भरी बातें सुननी चाहिए। अच्छी लगती है, बस उन पर यकीन नहीं करना चाहिए। लेकिन यह सब बातें ...

कुठाँव (२०१९) उपन्यास की समीक्षा

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  जातिवाद एक ऐसी समस्या है जो समाज में लोगों के बीच दूरियां उत्पन्न करती है। ऊंच-नीच का भाव हर धर्म में मौजूद है, चाहे वह हिंदू धर्म हो , मुस्लिम धर्म हो या कोई अन्य धर्म। प्रस्तुत उपन्यास "कुठांव" अब्दुल बिस्मिल्लाह द्वारा रचित एक ऐसा उपन्यास है जिसमें मूल रूप से मुस्लिम समाज में उपस्थित जात-पात को परत दर परत खोल कर सामने रखने का प्रयास किया गया हैं तथा हम देखते हैं कि जिस प्रकार से जातिवाद हिंदुओं में हैं, छोटी जाति,बड़ी जाति का भाव जिस प्रकार से हिंदुओं में जड़ बनी हुई है ठीक उसी तरह मुस्लिम संप्रदाय में भी जातिवाद फैला हुआ है।     कुठाँव शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है  "अनुप्रयुक्त स्थान"। इसका एक और अर्थ होता है," शरीर का कोमल या सुकुमार अंग"। इन दोनों ही अर्थों का चरितार्थ हमें उपन्यास पढ़ते पढ़ते पता चल जाता है।      उपन्यास के बारे में उपन्यास के बाह्य पृष्ठ में लिखा गया है कि 'कुठाँव' में स्त्री और पुरुष का, प्रेम और वासना का, हिंदू और मुसलमान का, ऊंची-नीची जातियों का एक भीषण परिदृश्य रचा गया है। अब्दुल बिस्मिल्लाह समाज की आंतरिक विड...

प्रेमचंद जयंती विशेष

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साहित्य का उद्देश्य निबंध की समीक्षा प्रेमचंद, जिनको बचपन से ही पढ़ते आ रहे उनकी आज १४०वीं  जयंती है। उनकी प्राय: रचनाएं आदर्श से पूर्ण है। यथार्थ का आगमन उनके परवर्ती रचनाओं में मिलता है । जिसके कारण उनके साहित्य को आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी साहित्य कहा जाता है। हमें पता है कि उन्होंने लगभग ३०० अधिक  कहानियाँ लिखी हैं और १५ उपन्यास की रचना की है । उन्होंने कुछ बाल रचनाओं की भी रचना की है। आज हम इनके कहानियों तथा उपन्यासों पर बात न करके इनके साहित्य के प्रति वैचारिक दृष्टि को देखेंगे।        आज हम इनके द्वारा रचित निबंध "साहित्य का उद्देश्य"   की समीक्षा करेंगे जो मूल रूप से प्रेमचंद द्वारा १९३६ के प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्षीय संबोधन के रूप में दिया गया था । बाद में इसे निबंध के रूप में प्रकाशित किया गया। इस निबंध में लेखक साहित्य और साहित्यकार का समाज के प्रति क्या कर्त्तव्य है तथा साहित्य का सृजन क्यों होना चाहिए,आदि बिंदुओं पर एक सारगर्भित और प्रेरणादायक विचार प्रस्तुत करते हैं।        साहित्य को प्रेमचंद "जीवन...

तुम्हारा होना ( एक एहसास)

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रात बहुत हो चुकी थी। मैं पढ़ रहा था, किताबें इधर उधर बिखरी पड़ी थी । मैं उन्हें सहेज कर रख दिया अपने उसी अलमारी में जहाँ मेरे जीवन के सबसे अहम अंश "किताबें" रखी रहती है । 💛 मैं अब सोने के लिए अपने चारपाई पर हूँ। मैं सोने की कई कोशिशें कर चुका हूँ , पर नींद मेरी आँखों के आस पास भी नहीं भटकती है। कुछ ऐसा है जिसे मैं भूल रहा हूँ । तभी मुझे दिखता है वह डायरी जिसमें मैं स्वयं को सिर्फ तुम्हारे लिए सीमित रखा हूँ। उस डायरी में तुम ठीक उसी भाँति मौजूद हो जैसे मेरी हृदय में साँसे। मैं उठा, उठ कर उन पृष्ठों को खोला जिन पृष्ठों में तुम्हारे होने का एहसास सबसे तीव्र , जिसमें मैं भी हूँ पर तुम कुछ अधिक हो ,उन्हें मैं पढ़ने लगता हूँ_ 💚 "मैं धड़कन हूँ किसी के सीने की उनके बिना अब ख़्वाहिश नहीं है मुझे जीने की।"💚 इसे पढ़ कर ही मैं यादों की अतल गहराइयों में उतरता जाता हूँ , जिसमें मैं और तुम साथ हैं, एक वृक्ष के नीचे बैठ हम और तुम अपने सपनों की दुनिया में खोये है। तभी तुम उठ जाती हो यह कह कर ...