दृश्यम-3 : कहानी सुनने से ज्यादा कहानी कौन सुना रहा है, उस पर ध्यान देना चाहिए
‘परिवार’—एक ऐसी पारिभाषिक शब्दावली, जिसके भीतर पूरा समाज और पूरी दुनिया समा सकती है। क्योंकि समाज हो या दुनिया, उसकी शुरुआत परिवार से ही होती है। परिवार का महत्त्व क्या होता है, यह उन अनाथालयों में रहने वाले बच्चों से पूछा जाना चाहिए, जिन्हें जन्म तो मिला, लेकिन परिवार नहीं मिला। उनके लिए वही अनाथालय उनका परिवार बन जाता है। शायद यही कारण है कि कोई भी व्यक्ति अपने परिवार पर आँच नहीं आने देना चाहता और आवश्यकता पड़ने पर उसकी रक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हो जाता है।
विजय सालगांवकर भी ऐसा ही एक चरित्र है। जो ‘दृश्यम’ नामक फिल्म का मुख्य पात्र है। दृश्यम जोकि तीन भाग में हमारे सामने प्रस्तुत है, अगर इसकी पूरी कहानी को यदि किसी एक शब्द में समेटना हो तो वह शब्द शायद ‘परिवार’ ही होगा। अजय देवगन द्वारा निभाया गया विजय सालगांवकर पहले भाग से ही अपने परिवार को बचाने के लिए परिस्थितियों से लड़ता दिखाई देता है। वह परिस्थितियों का शिकार भी है और उन्हीं परिस्थितियों का सबसे बड़ा खिलाड़ी भी।
‘दृश्यम’ की खासियत यही है कि यहाँ कहानी केवल यह नहीं है कि क्या हुआ, बल्कि यह भी है कि जो हुआ, उसे कौन किस तरह बता रहा है। इसलिए फिल्म को देखने का सबसे दिलचस्प तरीका यही है कि कहानी सुनने से ज्यादा इस बात पर ध्यान दिया जाए कि कहानी कौन सुना रहा है।
पहले भाग में मीरा देशमुख यानी तब्बू और महेश देशमुख यानी रजत कपूर के बेटे समीर की हत्या के बाद विजय और उसके परिवार पर संदेह जाता है। इसके बाद शुरू होती है एक ऐसी पड़ताल, जिसमें पुलिस एक-एक कर सुराग जुटाने की कोशिश करती है, तथा यह पड़ताल आखिरी हिस्सा( द कंक्ल्यूजन) तक आ जाती है, हर बार विजय उन सुरागों से पहले ही कई कदम आगे दिखाई देता है।
विजय को फिल्म में भले ही चौथी फेल बताया गया हो, लेकिन उसके दिमाग को पढ़ पाना किसी बड़े अधिकारी के लिए भी आसान नहीं है। वह किताबों की शिक्षा में भले पीछे हो, लेकिन परिस्थितियों को पढ़ने की उसकी क्षमता असाधारण है। पुलिस जब तक किसी सुराग तक पहुँचती है, विजय उस सुराग के संभावित परिणामों के बारे में पहले ही सोच चुका होता है।
अपनी पत्नी और बेटियों को बचाने के लिए विजय साम, दाम, दंड और भेद—हर संभव रास्ता अपनाता है। यहाँ उसकी लड़ाई केवल पुलिस से नहीं है, बल्कि समय, परिस्थितियों और अपने भीतर के डर से भी है। यही वजह है कि विजय का चरित्र धीरे-धीरे एक साधारण परिवार के मुखिया से बढ़कर फिल्म के सबसे रहस्यमय और दिलचस्प चरित्र में बदल जाता है।
‘दृश्यम-1’ से शुरू हुई पड़ताल ‘दृश्यम-2’ तक पहुँचती है, लेकिन विजय सालगांवकर के मस्तिष्क की पूरी गुत्थी अब भी आसानी से नहीं सुलझती। ‘दृश्यम-3: द कंक्ल्यूजन’ इसी अधूरी पड़ताल को उसके अंतिम पड़ाव तक ले जाने का प्रयास करती है। जहाँ पिछली फिल्मों में कुछ सवाल दर्शकों के मन में रह गए थे, वहीं तीसरा भाग उन्हीं सवालों को नए तरीके से सामने रखता है।
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह दर्शक को केवल कहानी देखने नहीं देती, बल्कि लगातार सोचने के लिए मजबूर करती है। एक सुराग सामने आता है तो उसके पीछे दूसरा सवाल खड़ा हो जाता है। एक बात स्पष्ट होती है तो उसी के साथ एक नई शंका जन्म लेती है। दर्शक बार-बार सोचता है कि आखिर सच क्या है और जो सच दिखाई दे रहा है, क्या वास्तव में वही सच है?
फिल्म में समीर देशमुख की मौत के बाद घटनाओं की जो कड़ियाँ बनी थीं, वे किस तरह एक-दूसरे से जुड़ती हैं और विजय उन परिस्थितियों को किस तरह अपने पक्ष में मोड़ता है—फिल्म का बड़ा हिस्सा इसी रहस्य को बनाए रखने में सफल रहता है। हालांकि कहानी को पूरी तरह समझने के लिए पहले दोनों भागों की घटनाओं को याद रखना जरूरी है, क्योंकि तीसरा भाग अपने अतीत से लगातार संवाद करता हुआ आगे बढ़ता है।
और फिर आता है वह हिस्सा जिसके लिए ‘दृश्यम’ की पूरी श्रृंखला जानी जाती है—क्लाइमेक्स।
बिना किसी स्पॉइलर के इतना कहा जा सकता है कि ‘दृश्यम-3: द कंक्ल्यूजन’ का क्लाइमेक्स दर्शकों को एक बार फिर अपनी सीट से बाँधे रखने की क्षमता रखता है। सिर्फ क्लाइमेक्स ही नहीं फिल्म प्रारंभ से ही दर्शक को अपने पाश में ले लेती है। फिल्म जिस सवाल को लेकर आगे बढ़ती है, उसका जवाब जिस अंदाज में सामने आता है, वह इस फ्रेंचाइज़ी की मूल आत्मा के अनुरूप है।
फिल्म का साउंड इफेक्ट और बैकग्राउंड म्यूजिक भी इसके माहौल को मजबूत करता है। कई दृश्यों में ध्वनि केवल दृश्य के साथ चलती नहीं, बल्कि दृश्य के तनाव को और बढ़ा देती है। ऐसा लगता है जैसे दर्शक केवल स्क्रीन पर कहानी नहीं देख रहा, बल्कि स्वयं उस कहानी के भीतर प्रवेश कर चुका है।
‘दृश्यम’ की सबसे बड़ी ताकत हमेशा से यही रही है कि वह दर्शक को पुलिस और अपराधी के बीच की सामान्य कहानी नहीं देती। यहाँ असली खेल दिमाग का है—कौन कितना आगे सोच सकता है, कौन किसकी सोच को पढ़ सकता है और कौन अपनी बनाई हुई कहानी पर कितनी देर तक कायम रह सकता है।
विजय सालगांवकर का चरित्र इसी वजह से याद रह जाता है। वह न तो कोई सुपरहीरो है और न ही कोई असाधारण जासूस। वह एक सामान्य परिवार का आदमी है, लेकिन अपने परिवार को बचाने की इच्छा उसे असाधारण परिस्थितियों में असाधारण फैसले लेने के लिए मजबूर करती है।
और शायद यही ‘दृश्यम’ का सबसे बड़ा सवाल भी है—
जब परिवार दाँव पर हो, तो एक सामान्य इंसान अपनी सीमाएँ कहाँ तक पार कर सकता है?
‘दृश्यम-3’ को केवल एक मर्डर मिस्ट्री या क्राइम थ्रिलर की तरह देखना शायद इसके साथ न्याय नहीं होगा। यह भरोसे, परिवार, अपराध, कानून और सच के बीच की उस जटिल दुनिया को सामने रखती है, जहाँ हर व्यक्ति अपनी-अपनी कहानी का सच लेकर खड़ा है।
इसलिए फिल्म देखते समय कहानी सुनने से ज्यादा इस बात पर ध्यान दीजिए कि कहानी कौन सुना रहा है।
क्योंकि ‘दृश्यम’ की दुनिया में जो दिखाई देता है, जरूरी नहीं कि वही पूरा सच हो।
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