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मैं वापस आऊँगा : प्रेम, विभाजन और विछोह की कहानी

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 "1947"--यह वर्ष सुनते ही मस्तिष्क में अनेक ध्वनियाँ स्वतः गूँजने लगती हैं। ये ध्वनियाँ हँसी-खिलखिलाहट की नहीं, बल्कि पीड़ा और विछोह की होती हैं। एक समय जो लोग साथ रहते थे, उन्हें अचानक यह पता चलता है कि अब उन्हें अलग-अलग रहना होगा। उन्हें अपनी जन्मभूमि, अपना घर-बार छोड़कर दूसरी जगह जाना होगा। कल तक का पड़ोसी आज का दुश्मन बन जाता है। लोग मारने-काटने पर उतारू हो जाते हैं और हजारों परिवारों को रातों-रात अपना सब कुछ छोड़कर पलायन करना पड़ता है। उस समय की परिस्थितियों की हम केवल कल्पना कर सकते हैं; जिन्होंने उसे जिया, उनके दुःख को पूरी तरह महसूस कर पाना संभव नहीं है। यही कारण है कि साहित्य, सिनेमा और कला के विभिन्न माध्यमों द्वारा उस त्रासदी की पीड़ा को समय-समय पर अभिव्यक्त करने का प्रयास किया जाता रहा है। विभाजन की इसी वेदना को इम्तियाज़ अली ने फिल्म "मैं वापस आऊँगा" में चित्रित किया है। विभाजन पर अनेक पुस्तकें और फिल्में बन चुकी हैं, किंतु "मैं वापस आऊँगा" प्रेम, विछोह और स्मृतियों की कथा को जिस संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती है, वह इसे विशिष्ट बना देती है।...