मैं वापस आऊँगा : प्रेम, विभाजन और विछोह की कहानी
"1947"--यह वर्ष सुनते ही मस्तिष्क में अनेक ध्वनियाँ स्वतः गूँजने लगती हैं। ये ध्वनियाँ हँसी-खिलखिलाहट की नहीं, बल्कि पीड़ा और विछोह की होती हैं। एक समय जो लोग साथ रहते थे, उन्हें अचानक यह पता चलता है कि अब उन्हें अलग-अलग रहना होगा। उन्हें अपनी जन्मभूमि, अपना घर-बार छोड़कर दूसरी जगह जाना होगा।
कल तक का पड़ोसी आज का दुश्मन बन जाता है। लोग मारने-काटने पर उतारू हो जाते हैं और हजारों परिवारों को रातों-रात अपना सब कुछ छोड़कर पलायन करना पड़ता है। उस समय की परिस्थितियों की हम केवल कल्पना कर सकते हैं; जिन्होंने उसे जिया, उनके दुःख को पूरी तरह महसूस कर पाना संभव नहीं है।
यही कारण है कि साहित्य, सिनेमा और कला के विभिन्न माध्यमों द्वारा उस त्रासदी की पीड़ा को समय-समय पर अभिव्यक्त करने का प्रयास किया जाता रहा है। विभाजन की इसी वेदना को इम्तियाज़ अली ने फिल्म "मैं वापस आऊँगा" में चित्रित किया है। विभाजन पर अनेक पुस्तकें और फिल्में बन चुकी हैं, किंतु "मैं वापस आऊँगा" प्रेम, विछोह और स्मृतियों की कथा को जिस संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती है, वह इसे विशिष्ट बना देती है। फिल्म देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि हम केवल दर्शक नहीं हैं, बल्कि उस समय को स्वयं जी रहे हैं। किसी निर्देशक की यही सबसे बड़ी शक्ति होती है कि वह दर्शक को निर्निमेष भाव से अपनी कथा में बाँधे रखे, और इम्तियाज़ अली में यह क्षमता विद्यमान है।
जैसा कि पहले कहा गया, फिल्म की पृष्ठभूमि विभाजन, उसके बीच पनपता प्रेम और फिर उसका विछोह है। कहानी पूर्वदीप्ति शैली (Flashback) में आगे बढ़ती है। एक वृद्ध व्यक्ति, जो जीवन की अंतिम शय्या पर है, अपनी स्मृतियों और अधूरे वादों से घिरा हुआ है। ये स्मृतियाँ और वादे क्या हैं—यही फिल्म का मूल प्रश्न और उसकी धुरी है। नसीरुद्दीन शाह के कंधों पर आरंभ हुई यह यात्रा आगे चलकर दिलजीत दोसांझ के माध्यम से अपनी पूर्णता प्राप्त करती है।
फिल्म में एक ओर मल्लिका दिलफरेब (नायिका) है और दूसरी ओर कीनू (नायक)। दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते हैं और विवाह करना चाहते हैं, किंतु परिस्थितियाँ उनके प्रतिकूल हैं। इसी बीच उनका सामना उस त्रासदी से होता है जिसके लिए वे तैयार नहीं हैं—भारत का विभाजन।
फिल्म वर्तमान और अतीत के बीच संतुलित ढंग से आगे बढ़ती है। वर्तमान का प्रतिनिधित्व निर्वैर (दिलजीत दोसांझ) करता है, जो विदेश में रहने वाला एक युवा है। कई नौकरियाँ छोड़ने के बाद वह अपने बीमार दादाजी के कारण भारत लौटता है। दादाजी की बातों, संकेतों और उनकी स्मृतियों को समझते हुए वह उनकी अंतिम इच्छा को पूरा करने का प्रयास करता है। इसी प्रक्रिया में अतीत की कहानी धीरे-धीरे खुलती है।
फिल्म शुरू से अंत तक एक रूमानी कथा की तरह दर्शक को बाँधे रखती है। वेदांग रैना (कीनू) और शरवरी (अफसाना उर्फ जिया) ने अपने अभिनय से प्रेम को सजीव कर दिया है। उनके संवादों में एक काव्यमयता है; उनकी हर पंक्ति और हर शब्द भावनाओं से परिपूर्ण प्रतीत होता है। दूसरी ओर, दिलजीत दोसांझ और बनिता संधू आज के आधुनिक संबंधों की जटिलताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। दिलजीत के माता-पिता के माध्यम से समकालीन पारिवारिक संबंधों और पीढ़ियों के बीच के अंतर को भी दिखाने का प्रयास किया गया है। वहीं नसीरुद्दीन शाह उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसका शरीर भले वर्तमान में हो, पर हृदय आज भी सरगोधा की गलियों में भटकता है।
फिल्म में प्रवेश करते ही दर्शक का परिचय एक ऐसे शहर से होता है, जो वस्तुतः इस फिल्म की आत्मा है। वह शहर केवल एक स्थान नहीं, बल्कि स्मृतियों, रिश्तों और बिछड़ने की पीड़ा का प्रतीक है। वहाँ रहने वाले सुंदर और सरल लोगों को कुछ स्वार्थी राजनीतिक निर्णयों और परिस्थितियों के कारण एक-दूसरे से दूर होना पड़ा। यही पीड़ा फिल्म के हर दृश्य में कहीं न कहीं उपस्थित रहती है।
फिल्म का संगीत भी इसकी सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है। सभी गीत मधुर, भावपूर्ण और कथा के अनुकूल हैं। विशेष रूप से दिलजीत दोसांझ की आवाज़ में प्रस्तुत एक गीत वर्तमान समय की विघटनकारी प्रवृत्तियों पर प्रहार करता है तथा समाज में शांति, प्रेम और सौहार्द का संदेश देता है।
"मैं वापस आऊँगा" केवल विभाजन की कहानी नहीं है, बल्कि स्मृतियों, प्रेम, प्रतीक्षा और अपने वतन से जुड़ी भावनाओं की कहानी है। यह फिल्म बताती है कि सीमाएँ जमीन को बाँट सकती हैं, किंतु मनुष्यों की यादों और प्रेम को नहीं। विभाजन की त्रासदी के बीच जन्मी यह प्रेमकथा दर्शक के मन में लंबे समय तक बनी रहती है और उसे यह सोचने पर विवश करती है कि इतिहास के सबसे बड़े घावों में भी इंसानियत और प्रेम की लौ कभी पूरी तरह बुझती नहीं।



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